संदेश

शहादत

बहुत उमड़ रहा प्रेम लोगों में जवानों की शहादत पर
कहां थे वे जब बरस रही थी लाठियां इन जवानों पर।ये  कैसा छद्म  देशभक्ति  है कोई  जाकर पुछे उनसे
बहा रहे हैं घड़ियाली आंसू निकाल रहे कैंडिल मार्च। क्या तुम भूल गए उड़ी और पठानकोट के हमले को
क्या किए तुम जवाब दो जवानों की विधवाओं को । छा गया है मातम पसर गया है सन्नाटा मिट गई है सिंदूर
तुम्हें इससे फर्क क्या पड़ता है जाओगे तुम इसे भी भूल। अगर करना ही चाहते हो इनके लिए तुम कुछ भी
क्या पक्ष क्या विपक्ष निकालो इन सब गद्दारों को। चुनाव जीतने के लिए न जाने ये कितने कुकर्म करेंगे
इन कुकर्मों की सजा न जाने कबतक सैनिक भुगतेंगेसारी  समस्याओं  का  जड़  यही   पर   निहित  है
यही से निकलेगा सारी समस्याओं का समाधान भी। आओ सबकुछ छोड़कर, विचार करें इन समस्याओं पर
फिर न कभी सैनिक मरेंगे न होंगी विधवाओं की मांगे सुनी।

नहीं चाहते हैं हम खून-खराबा नहीं चाहते हैं हम बदला
हम चाहते हैं शांति आओ मिलकर विचार करें हम सभी।
प्रियदर्शन कुमार

आरक्षण

काव्य संख्या-209
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आरक्षण
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चलो,
उसने कुछ तो दिया,
नौकरी न सही,
आरक्षण तो दिया,
झूठा ही सही,
सबका साथ सबका विकास तो किया,
सबके हाथ में लॉलीपॉप तो दिया,
एससी-एसटी-ओबीसी को ही नहीं,
मुस्लिम-सिख-ईसाई को ही नहीं,
सवर्णों को भी तो ठगा,
बजाओ,
खूब बजाओ,
आरक्षण का झुनझुना,
जो पिछले सत्तर साल में नहीं हुआ,
उसने बहत्तर घंटे में कर दिया,
हां, सवर्णों को भी मुर्ख बना दिया,
आरक्षण का टुकड़ा फेंक दिया,
सवर्णों, अब कुछ मत कहना,
उसने विकास कर दिया,
तुम्हारे स्वाभिमान को
आरक्षण से खरीद लिया,
चलो,
उसने कुछ तो दिया,
नौकरी न सही,
आरक्षण तो दिया,
  प्रियदर्शन कुमार

पुनर्नवजागरण

पुनर्नवजागरण
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            मेरे द्वारा दिए गए पुनर्नवजागरण शीर्षक पर पाठकों को आपत्ति हो सकती है कि ये क्या नया शब्द गढ़ लिया है, वो भी 21वीं सदी में, जबकि यह काल ज्ञान-विज्ञान के उत्कर्ष का काल है। मानव सभ्यता के उत्कर्ष का काल है तो इसका कारण यह है कि जिस आस्था को तर्क से, ईश्वर केन्द्रित चिंतन को मानव केन्द्रित चिंतन से तथा भावुकता को बौद्धिकता से प्रतिसंतुलित करते हुए भारतीय नवजागरण आंदोलन की शुरुआत हुई थी तथा मध्यकाल और आधुनिक काल के बीच एक लकीर खींची गई थी। ऐसा प्रतीत होता है कि यह लकीर धीरे-धीरे गहराने की बजाय और भी मिटती जा रही है।हो सकता है कि आप मेरी बात से इत्तेफाक न रखें लेकिन यह सच है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ कि एक बार फिर हमलोग मध्यकाल की ओर जा रहे हैं। एक बार फिर हमलोग आस्था, भावुकता और ईश्वर केंद्रित चिंतन के मकड़जाल में उलझते जा रहे हैं तथा तर्क, बौद्धिकता और चिंतन ताक पर रख दिया गया है। धर्म के नाम पर लोगों की हत्या, जातिवाद, मंदिर-मस्जिद को लेकर झगड़ा, भगवान् की जाति व धर्म को लेकर लोगों के बीच झगड़ा,गाय को लेकर लोगों की हत्या, माॅब लिंचिग, पुष्पक विमान क…

नव-वर्ष

नव वर्ष
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नव वर्ष
नयी उम्मीद
नये उमंग
नयी सोच
नये विचार
नया आगाज
नये लक्ष्य
नया स्वप्न
नये इरादे
नयी कसमें
नये वादे
के साथ
नया करने
नया पाने
के लिए
बढ़े हम
बढ़े सब
इसी के
साथ
नूतन वर्ष
का स्वागत
करें हम।
प्रियदर्शन कुमार

आशा

आशा
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धूंधला-सा हो गया हूँ मैं
धूंधली-सी हो गई है मेरी छाया
ढ़ल गया है दिन
छा गया है अंधेरा
इंतजार है उसे भी
इंतजार है मुझे भी
ये दिन भी गुजर जाएगा
हमारे भी आएंगे अच्छे दिन
समय-समय की बात है
दिन होता नहीं है हमेशा एक समान
हारना नहीं सीखा है हमने
लड़ रहा हूँ मैं खुद से
लड़ रहा हूँ मैं समय से
लड़ने के सिवाय कुछ भी
नहीं है मेरे बस में
मानकर चलता हूँ मैं
मेहनते बेकार नहीं जाती
यह रंग तो लाएगी
थोड़ी देर से ही सही
आशा है मुझे
निराशा नहीं मुझे।
प्रियदर्शन कुमार

अतीत बनाम वर्तमान

अतीत बनाम वर्तमान
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        अतीत और वर्तमान के बीच अपनी-अपनी प्रमुखता को लेकर बहस चल रही थी। वर्तमान ने अतीत से कहा कि तुम मेरे विकास में बाधक हो। मैं जब भी तुम्हें भूलाने की कोशिश करता हूँ और अपने स्वतंत्र अस्तित्व की बात करता हूँ तथा भविष्य को संवारने की कोशिश करता हूँ तो तुम मेरे कदम को पीछे खींचते हो।मैं तुमसे कोई रिश्ता नहीं चाहता। अतीत ने नाराजगी जाहिर करते हुए वर्तमान से कहा कि तुम मेरे उपर गलत आरोप लगा रहे हो। हां, यह सच है कि मैं हमेशा तुम्हारे पीछे लगा रहता हूँ। तुम मुझे लाख भूलाने की कोशिश करते हो लेकिन मैं ऐसा नहीं होने देता, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं तुमसे जलती हूँ या तुम्हारे प्रगति के मार्ग में बाधक हूँ। मैं इसलिए तुम्हारा साथ नहीं छोड़ता हूँ कि कहीं तुम्हारे अंदर घमंड न आ जाए जो कि किसी भी मनुष्य के विनाश का कारण होता है। तुम्हारे अंदर जो परिवार और समाज के प्रति आदर का भाव था, संवेदना और सहानुभूति का भाव था, सुख-दुख में सहभागिता थी, वो खत्म न हो जाए या तुम भूल न जाओ। अक्सर लोग ऊंचाइयों पर जाने के बाद परिवार और समाज से कट जाते…

किसान

काव्य संख्या-207
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किसान
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मैं किसान हूँ
मेरा काम है खेती का
रहने के नाम पर
मेरे पास एक घर है
जो फूस का बना है
बरसात के दिनों में
टप-टप पानी टपकता है
गर्मी के मौसम में
सूर्य की किरणें झांकती हैं
एक टूटी हुई खाट
कुछ बर्तन
पहनने के नाम पर
फटा-चिथरा कपड़ा हैं
जो मेरे तन को ढकने में असमर्थ है
सर पर पगड़ी है
जो स्वाभिमान का प्रतीक है
एक लाठी है
जो सहारा देने का काम करता है
स्वप्न भी छोटे
आकांक्षाएं भी छोटी-सी
मेरा फसल अच्छा हो
अच्छी उपज हो
भरी दोपहरी हो
बरसात हो
या फिर हो शीतलहर
हर स्थिति में
मैं अनाज पैदा करता हूँ
ताकि पेट की आग को शांत कर सकूं
अपनी नहीं, दूसरों की
अपने लिए तो कुछ भी नहीं बचता
अपने लिए बचता है तो
केवल ऋणजाल
महाजनों का
कभी न चुकने वाला
मजदूरी कर पेट पालता हूँ
अपनी आयु से अधिक का दिखता हूँ
पैरों में छाले पड़े हैं
मैं समाज के हाथों का खिलौना हूँ
जिसके जज्बातों से सब खेलते हैं
लोकतंत्र के नाम पर
मुझे बस वोट देने का अधिकार है
ताकि लोकतांत्रिक देश में रहने का अहसास हो सके
सवाल पूछने का अधिकार नहीं है
सवाल पूछने पर गोलियां …