ऐ सियासत तुम्हारे खेल निराले हैं
काव्य संख्या-175 --------------------------------------- ऐ सियासत तुम्हारे खेल निराले हैं (28/04/2018) --------------------------------------- ऐ सियासत तुम्हारे खेल निराले हैं / जिसने तुमपे उंगलियां उठाई उसे मंत्री बना दिया / जिसने आँख खोली उसे सदा के ...