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ऐ सियासत तुम्हारे खेल निराले हैं

काव्य संख्या-175 --------------------------------------- ऐ सियासत तुम्हारे खेल निराले हैं (28/04/2018) --------------------------------------- ऐ सियासत तुम्हारे खेल निराले हैं / जिसने तुमपे उंगलियां उठाई उसे मंत्री बना दिया / जिसने आँख खोली उसे सदा के ...

जनवादी

जनवादी (25/04/2017) ================ मैं हूँ जनवादी जन-मन में है मेरी आस्था। जब भी मैं देखता हूँ भूख से बिलखते बालक को द्रवित हो उठती है मेरी अंतर्आत्मा नहीं समर्थक मैं किसी पार्टी विशेष का समर्थ...

नेता

काव्य संख्या-227 ============= नेता ============= बता, तुम्हारी मौत पर मैं क्या करूं ताली बजाऊं, थाली बजाऊं या फिर दीप जलाऊं विलाप करूं या फिर संवेदना के दो शब्द कहूं मरने वालों की सूची में न तो तुम प...

एक ईमानदार आदमी

काव्य संख्या-173 -------------------------- एक ईमानदार आदमी -------------------------- जन्म से वह नहीं था झूठा वह नहीं था बेईमान और फरेबी गरीबी की चोट खाता रहा है वह हरदम हर मुश्किलों का सामना करता रहा है वह हरदम अपनी ज़म...

आधुनिकता

आधुनिकता (07/04/2017) ================== आधुनिकता के नाम पर देश में नंगा नाच हो रहा। हमारी सभ्यता और संस्कृति का जो निरंतर नाश कर रहा। पश्चिम के प्रभाव ने हमें अपने आगोश में ले लिया। अपने सारे सद्ग...

तुम

काव्य संख्या-226 ============= तुम ============= बहुत बड़ी-बड़ी बातें करते हो तुम। जमीं की नहीं, आसमां के लगते हो तुम। तुम्हें समझ नहीं दौर-ए-दुनिया की, नासमझ वाली हरकतें हमेशा करते हो‌ तुम। कोई भी न...

चौथा स्तंभ

चौथा स्तंभ (03/04/2017) ================== ओ लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मत गिराओ अपने आचरण। मत घूमों सत्ता के गलियारों में मत गुणगान करो नेताओं का। चंद लाभ प्राप्त करने की खातिर मत गिरवी रखों अपने स्व...