दंगा
काव्य संख्या-224 ================ दंगा ================ साम्प्रदायिकता की आग में ख़त्म हो गये सब रिश्ते नाते उन बस्तियों को जला दिया उन्होंने, जिनमें वर्षों से साथ रह रहे थे हम सारे, थी मुस्कान उनके हों...
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