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हां ! मैं कविता हूं

काव्य संख्या-230 =========== हां ! मैं कविता हूं =========== हां ! मैं कविता हूं  मैं स्थिर नहीं,  मैं गतिशील हूं  समय के साथ बदलता हूं  परिस्थितियों के अनुरूप ढ़लता हूं मैं शांति हूं मैं क्रांति हूं मैं लवों पर मुस्कान हूं मैं आंखों में समंदर हूं मुझे न किसी से बैर है मेरा न कोई दुश्मन है मैं सुख-दुख का साथी हूं हां ! मैं कविता हूं। मैं आयना हूं खुद के अंदर झांकने की, लोगों को सलाह देता हूं मैं दीपक हूं  दूसरों को रास्ता दिखाता हूं मैं अभिभावक हूं मार्गदर्शन करता हूं मैं अतीत को भूलता नहीं हूं मैं वर्तमान में जीता हूं मैं भविष्य को संवारता हूं हां ! मैं कविता हूं। मैं चेतना हूं मैं संवेदना हूं मैं विरह में हूं मैं मिलन में हूं मैं वेदना में हूं मैं प्रेम में हूं मैं 'स्व' में भी हूं मैं 'पर' में भी हूं मैं लघुता में भी हूं मैं विराटता में भी हूं मैं यति गति लय हूं हां ! मैं कविता हूं। मेरे अंदर जीवटता है मेरे अंदर जीजिविषा है मेरे अंदर ऊर्जा है मेरे अंदर उत्साह है मेरे अंदर करूणा है मेरे अंदर स्नेह है हां ! मैं कविता हूं मैं गरीबों की कुटिया में भी हूं मैं राजा...

हां, हां ! हमने भी सामाजिक न्याय होते देखा है

काव्य संख्या-229 ============================= हां, हां ! हमने भी सामाजिक न्याय होते देखा है। ============================= हां, हां ! हमने भी सामाजिक न्याय होते देखा है न्याय को सत्ता का रखैल बनते देखा है,  बाइज्जत बरी होते हत्यारों को भी देखा है,  हां, हां ! हमने भी सामाजिक न्याय होते देखा है।  निर्भया के साथ न्याय होते देखा है,  दलित महिला के साथ भी न्याय होते देखा है, हां, हां ! हमने भी सामाजिक न्याय होते देखा है।  जिस्म को भी जाति में बंटते देखा है,  जिस्म को भी वर्ग में बंटते देखा है,  हां, हां ! हमने भी सामाजिक न्याय होते देखा है। मुजफ्फरपुर रेलवे प्लेटफार्म का दृश्य देखा है, मृत मां के कफ़न से बच्चे को भी खेलते देखा है, हां, हां ! हमने भी सामाजिक न्याय होते देखा है। लॉक डाउन में गरीब-मजदूरों के पैरों के छाले को देखा है, चार्टर प्लेन से हस्तियों को भी लाते देखा है, हां, हां ! हमने भी सामाजिक न्याय होते देखा है। सामाजिक न्याय के नाम पर चुनाव जीतते देखा है,  जीतने के बाद किसानों, मजदूरों, शोषितों को खून के आंसू रूलाते भी देखा है,  हां, ह...

हे नारी !

काव्य संख्या-134 27/09/2017 ---------------------- हे नारी!  छोड़ तू अपना  सहज सरल सौम्य रूप  धारण कर तू रणचंडी का रूप  व्यर्थ तू किसी को अपनी व्यथा सुनाती है  व्यर्थ में तू अपना खून जलाती है  रामायण में सीता के चरित्र पर भी अंगुली उठी थी  रो-रो कर बुरा हाल था  पर, एक ने भी नहीं सुनी उसकी पीड़ा  उसे भी अपनी पवित्रता का सबूत  अग्नि में प्रवेश कर देना पड़ा  द्वापर में भी रुक्मिणी के एक पति थे कृष्ण  लेकिन कृष्ण की पत्नी केवल एक रुक्मिणी नहीं थी  समाज में कभी भी नहीं रहा है नारी का सम्मान  हमेशा रही है नारी असमानता की शिकार, इसलिए  हे नारी !  तू मत सुना किसी को अपनी करूण व्यथा  अधिकार मांगने से नहीं मिलता इस जग में  यहां अधिकार छीनना पड़ता है  यहां कदम-कदम पर लड़नी पड़ती है लड़ाई  इज्ज़त शोहरत और सम्मान के लिए, इसलिए  हे नारी!  तू अपनी आँखों में  अश्कों की बजाय रक्त ला शीतल ह्रदय में अग्नि की ज्वाला जला कोई एक आँख दिखाए तू दोनों दिखा तू मत बन बेबस और लाचार  तू मत फैला दूस...

जिंदगी

जिंदगी 18/07/2017 ========== मैं खुशी की तलाश में निकला था लेकर गम आ गया हूँ चलो, कुछ भी तो मिला दुनिया से, जो था उसके पास, उसने मुझे दिया चलो, उसी गमों के सहारे जी जाए जिंदगी। क्या-क्या सपने नहीं देखें थे मैंने सबको टूटते हुए देख रहा हूँ चलो, अच्छा हुआ !  उससे भी कुछ सिख मिल जाए मुझे। जिंदगी की किताबों में कई पन्ने ऐसे हैं जहाँ, सिर्फ पीड़ा-ही-पीड़ा है चलो, आज उस पन्ने को भी  पलट कर पढ़ ही लिया मैंने। पीड़ा भी जिंदगी जीना सिखाती है अपने और पराएपन अहसास कराती है  चलो, आज उस अहसास को भी महसूस कर लिया मैंने। पीड़ाएँ आती हैं आएं उससे मुझे कोई कुरेद नहीं चलो, ऐ जिंदगी उसे भी खुशी-खुशी अपनाएँ।                                       प्रियदर्शन कुमार

बचपन

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बचपन 18/07/2018 ========== काव्य संख्या-191 ================== बचपन कितना मनमोहक है  ================== देखो बचपन कितना अच्छा है  कितना खुश यह बच्चा है  न पढ़ाई-लिखाई की चिंता है  न मम्मी-पापा के डांट की बिल्कुल निर्भीक  न किसी प्रकार की जिम्मेदारी है  न किसी भी चीज की चिंता  न सामाजिक बंधन है  न किसी प्रकार का विरोध  न दुनिया-दारी की चिंता है  न पारिवारिक माया-मोह  हँसता-खेलता बच्चा है  अपने एक मुस्कान से सबका दिल जीत लेता है  स्वच्छ निर्मल मन बिल्कुल कोरा कागज  छल-कपट के लिए जगह नहीं  न इसे जाति का भान है  न ही किसी मजहब का ज्ञान  ऊंच-नीच मालूम नहीं उसे नहीं मालूम है उसे अमीरी-गरीबी  यह तो केवल बच्चा है  जो केवल वात्सल्य का भूखा है  जहां मिलता है प्यार उसे  उसी के पास चला जाता है  कौन है अपना,  और कौन पराया  नहीं है उसे पहचान  परिवार-समाज सबका चहेता है  सबके यहाँ आता-जाता है  सबका स्नेह पाता है  सच में,  बचपन कितना मनमोहक है।    ...

आह ! दफ्न होते मेरे स्वप्न

आह ! दफ्न होेते मेरे स्वप्न। (17/07/2017) -------------------------------- मैं श्मशान में बैठा, आते-जाते लोगों को देख रहा था उनकी बातों को सुन रहा था उनकी बातों को सुनकर ऐसा लगा, जैसे मानो मैं अपनी उस कल्पना के समाज में जी रहा हूँ जिसकी कामना मैं करता था जिसके लिए मैं निराशा में डूबा हुआ था। उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था  जैसे उनके अंदर चेतना का प्रवेश हो गया हो सिर्फ नैतिकता की बातें हो रही थी, क्या लेकर आए हो क्या लेकर जाओगे, आपस में क्या बैर रखना, एक दिन हम सभी को भी इसी जलते हुए लाश की तरह ही, इसी मिट्टी में मिल जाना है, हम क्यों और किसके लिए अपने ईमान को बेचें, आदि-आदि बातें लोग कर रहे थे। लेकिन, जैसे ही संस्कार के बाद नदी में स्नान कर निकलते है मानो उनकी चेतना उनका विवेक उनकी बुद्धि, सारा कुछ उसी स्नान के साथ धूल गया हो फिर, उसी दिन-दुनिया में लौट आते हैं एक बार फिर, मेरे सपनोँ का समाज स्वप्न में ही बना रह जाता है हकीकत का रूप नहीं ले पाता। इसप्रकार, टूटते हुए स्वप्न को देखकर एक बार फिर, मैं निराशा में डूब गया आह ! दफ्न होेते मेरे स्वप्न।           ...

मैं असभ्य हूं

मैं असभ्य हूं (16/07/2016) =========== मैं असभ्य हूँ --------------- पुराने जमाने के लोग  बहुत भावुक हुआ करते थे, थोड़ी-सी भी नैतिकता पर  आंच आने से इमोशनल हो जाया करते थे। पर अब जमाना बदल गया, समाज तो वहीं है पर, समाज में रहने वाले लोग बदल गये। अब नैतिकता शब्द बेगाना हो गया। परिवार अब पति-पत्नी-बच्चे तक सीमित हो गया। अपने सुख से सुखी खुशी के मतलब हो गये। सम्वेदना और सहानुभूति शब्द से  हम अपरिचित गये। इसे ही हम अगर सभ्य होना कहते हैं, तो मैं असभ्य कहलाना अधिक पसंद करूंगा।                                       प्रियदर्शन कुमार