संदेश

एक नयी सुबह

आज फिर एक नई सुबह / एक नयी उमंग / नये उम्मीदों के संग / बढ़ चले हैं हम / बिना अंजाम की परवाह किए / आँखों में एक नये सपने लिए / उसके पीछे भागते / उठते गिरते खुद को सम्भालते / थकते-रूकते / औ...

मौसम की तरह बदलते हैं लोग यहां

मौसम की तरह बदलते हैं लोग यहां ऐ साहब ! अगर मैं हँसता हूँ तो सभी मेरे साथ हँसते हैं और जब मैं रोता हूँ तो केवल मैं ही रोता हूँ साथ छोड़ जाते हैं लोग हालात से खुद लड़ते हैं अपने ह...

हमसफ़र

मुझे  तुम्हारी   सुरत  नहीं,   सीरत    चाहिए। मुझे जो पलकों पर बिठाए, हमसाथी चाहिए।। मुझे   तुम्हारा   धोखा   नहीं,  साथ   चाहिए। मुझे  दर्द   देनेवाला   नहीं ,  हमदर्द   ...

खंडहर, जो कभी घर था

उन खंडहरों को देखो, जिसे कभी घर कहा जाता था, जिसमें कभी बच्चों की किलकारियाँ गूँजती थी, हँसी-ठहाके की आवाज़े आती थीं, चहल-पहल था, बुजुर्गों का साया था, भरा-पूरा परिवार था, खुशनु...

साहित्य की सार्थकता : वर्तमान संदर्भ

साहित्य की सार्थकता : वर्तमान संदर्भ प्रियदर्शन कुमार ------------------------------------------------------------------- जब हम साहित्य की सार्थकता की बात करते हैं तो इससे हमारा आशय यह है कि एक साहित्यकार अपने साहित्यिक उत्तर...

मैं लिखता हूँ तब, जब अंदर से रोता हूँ तब

मैं लिखता हूँ तब जब अंदर से रोता हूँ तब मैं अंदर से रोता हूँ तब जब पीड़ा में होता हूँ तब मैं पीड़ा में होता हूँ तब जब बिखरता हूँ तब मैं बिखरता हूँ तब जब अंदर से टूटता हूँ तब मैं ...

दीप जलती नहीं मन की

दीप जलती है यहां मगर जलती नहीं मन की काश कि ऐसा हो पाता तो अंधियारा नहीं होता हर तरफ है यहां पर झूठ - फरेब का बोलबाला हर एक को देखते हैं लोग यहां घृणा भरी नजरों से अगर खत्म करना ...