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विकास का कैसा नारा है

विकास का कैसा नारा है (25/03/2017) ========================== यह विकास का कैसा नारा है जहां लाखों लोग भूखे सोते हैं बच्चे एक निबाले को तरसते हैं खुले आसमान के नीचे सोते हैं किसान आत्महत्या करते हैं मजदूरो...

चेतना

चेतना (24/03/2017) =============== हमारी प्रगतिशील चेतना जिसमें प्रगति तो हुई लेकिन चेतना शुष्क पड़ गई हमारा समाज जो हमें कभी अनुशासित करने का काम करता था नैतिकता का पाठ पढ़ाता था आज वह व्यक्ति-व...

मैं अन्नदाता हूं

मैं अन्नदाता हूं (23/03/2017) =================== मैं अन्नदाता हूँ वह अन्नदाता जो देश के सभी लोगों के लिए अनाज पैदा करता हूँ सबका पेट भरता हूँ कड़ाके की ठंड हो या फिर चिलचिलाती धूप हो एक नत होकर परिश्र...

मुक्ति

मुक्ति (23/03/2017) ============== भगत-सुखदेव-राजगुरु आज फिर तुम्हारी जरूरत आ पड़ी तब तुमने विदेशी आक्रांताओं से देश को मुक्ति दिलाया था आज तुम्हें , देश के आंतरिक आक्रांताओं से मुक्ति दिलाना ह...

शिक्षित होने की पहचान

शिक्षित होने की पहचान (22/03/2018) ========================== जब छोटा था / तो मैं अनजाना था / सबके यहाँ आना-जाना था / जब बड़ा हुआ तो जाना / हम हिन्दू हैं वो मुसलमान / हम ब्राह्मण हैं वो शूद्र / हां, वास्तव में, यहीं है...

रोज आती हो मेरे सपनों में

गजल (22/03/2017 =================== रोज आती हो तुम मेरे सपनों में रोज करती हो तुम प्यार की बातें। मैं भी सपनोँ को हकीकत मानकर रोज खो जाता हूँ तेरे ख्यालों में। मैं यहां तक भूल जाता हूँ कि सपने तो सपने ह...

हम-तुम

गजल (21/03/2017) =================== वर्षों बाद मैं गजल लिख रहा हूँ फर्क बस इतना है तब तुम्हारे प्यार में  लिखता था अब तुम्हारे गम में लिख रहा हूँ। आज फिर याद आ गए वो दिन वो सारी बातें छा गए मन मंदिर पर। ...