संदेश

अक्टूबर, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

21वीं सदी

काव्य संख्या-201 ============================ 21वीं सदी ============================ 21वीं  सदी  में भारत  की तस्वीर कैसी बन गई मूल्य-नैतिकता आचार-विचार सब लुप्त हो गई। कहां से हम चले थे और कहां पहुंच गए हम अपनी परंपराओं को कैसे ...

मैं

मैं चाहता हूँ कुछ ऐसा कर जाऊं कि दुनिया अपने दिल में पनाह दे मुझे मैं चाहता हूँ कुछ ऐसा लिख जाऊं कि वह तासीर बन जाएँ मैं चाहता हूँ कि हर लाईब्रेरी का एक हिस्सा मैं बन जाऊं मैं...

मा.. एँ मरती नहीं कभी

----------------------------- माँ.. एँ मरती नहीं कभी ----------------------------- माँ.. एँ मरती नहीं कभी वो रहती हैं हम साया बनके हमेशा हमारे साथ जब भी दुखित मैं होता हूँ मुख से निकलता यकायक माँ एक क्षण में मानो जैसे मेरा सारा ...

सच में, वो आदमी नहीं वो है मौन प्रतिमा-सा

----------------------------- सच में, वो आदमी नहीं वो है मौन प्रतिमा-सा ----------------------------- सच में, वो आदमी नहीं वो है मौन प्रतिमा-सा जिनकी आँखे तो खुली है पर, देख पाने में असमर्थ है जिनके पास कान तो है पर, सुनने में असम...

टूटते सपने

इन नन्हीं-सी आँखों ने बड़े-बड़े सपने पाले हैं कुछ कर गुजरने की इनमें चाहत के हिलोरें हैं लेकिन हालात के आगे ये बेबस नजर आते हैं दिखाई पड़ते हैं इनके टूटते हुए सपने गरीबी की थ...

नीतियां नहीं नियत ठीक करो

कोई जाकर पूछो उनसे कैसे राजा हो तुम हे राजन् ! तूने कैसी नीतियाँ बनायीं प्रजा हो गई है भिखारी क्या ऐसे ही दिन दिखाने को राजा चुना था तुम्हें उन्होंने प्रजा कर रही है त्राहि...

मातृभूमि की वेदना

----------------------------------- सिसक रही है भारत माता, अपने ही लालों की करनी से / हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई, पालन-पोषण में, कभी न की अंतर उसने / आखिर क्या परवरिश में कमी रह गई, कि खून के प्यासे हो गए एक-दूजे के /...

प्रकृति

हे मानव ! मत लगाओ प्रकृति पर प्रतिबंध मत तोड़ों प्रकृति से रिस्ता ऐसे पथ पर मत चलो जो तुम्हें विकास की बजाय विनाश की ओर अग्रसर कर दे मत हो तू अपने अस्तित्व को मिटाने को आतुर तू ...

संसद में देखो आजकल क्या हो रहा है लोकतंत्र का गला कैसे घोंटा जा रहा है।

======================= संसद में देखो आजकल क्या हो रहा है लोकतंत्र का गला कैसे घोंटा जा रहा है। ======================= संसद में देखो आजकल क्या हो रहा है लोकतंत्र का गला कैसे घोंटा जा रहा है। जिस स्वतंत्रता के लिए ...

खामोशियां भी कुछ कह रहीं हैं गर तुम समझ सको तो समझो।

खामोशियां भी कुछ कह रहीं हैं गर तुम समझ सको तो समझो। सबकुछ लफ्जों में बयाँ नहीं होते हैं गर इशारों में समझ सको तो समझो। हर तरफ पसरा हुआ है सन्नाटा गर सन्नाटे को समझ सको तो सम...

माँ

___________________ माँ तुम्हारे आँखों में आँसू मुझसे देखा नहीं जाता मैं बदकिस्मत हूँ कि तुम्हारे आँसूओं को पोछ नहीं पाता तुम दुनिया के आगे कभी हार नहीं मानी पर तुम्हें घर में हारते हुए म...

दीवारों के भी कान होते हैं

--------------------------------------- यहां दीवारों के भी कान होते हैं --------------------------------------- जरा-सा धीरे बोलो / कहीं कोई सन न ले/ यहां दीवारों के भी कान होते हैं / हर तरफ साजिशें चल रही हैं / चारों ओर सन्नाटा पसरा है / शायद किसी त...

नदियों की मौन व्यथा

काव्य संख्या - 152 -------------------------- नदियों की मौन व्यथा --------------------------- चलो आज सुनाता हूँ नदियों की मौन व्यथा कल-कल छल-छल करती धाराओं से शायद निकलती है करूण ध्वनि शायद बयाँ करना चाहती है अपनी पीड़ा को ...

बचपन कितना मनमोहक है

================== बचपन कितना मनमोहक है ================== देखो बचपन कितना अच्छा है कितना खुश यह बच्चा है न पढ़ाई-लिखाई की चिंता न मम्मी-पापा के डांट की बिल्कुल निर्भीक न किसी प्रकार की जिम्मेदारी है न क...

ख्वाहिशें

काव्य संख्या-198 ============ ख्वाहिशें ============ ख्वाहिशें मेरी भी थीं, उसके पीछे भागा मैंने भी था, लेकिन पूरी हो न पायी , शायद समय को मंजूर न था, शायद इसीलिए मैं जहां का तहां ही रह गया, लेकिन, शिका...