प्रकृति

हे मानव !
मत लगाओ
प्रकृति पर प्रतिबंध
मत तोड़ों प्रकृति से रिस्ता
ऐसे पथ पर मत चलो
जो तुम्हें विकास की बजाय
विनाश की ओर अग्रसर कर दे
मत हो तू अपने अस्तित्व को मिटाने को आतुर
तू पा नहीं सकता प्रकृति पर नियंत्रण
तू डाल-डाल वो पात-पात
विकास करो आगे बढ़ो लेकिन
प्रकृति से मत नाता तोड़ों
उसे साथ लेकर चल
मत हो तू उससे विलग
तू डर प्रकृति के प्रकोप से
तू उसके संकेत को समझ
तू सम्भल
मत दे तू मृत्यु को आमंत्रण
तू मत कर उसकी सुंदरता को खत्म
वह तुझे पालती है पोषती है
वह तुझे पनाह देती है
तू मत प्रकृति के साथ नमकहरामीपन कर
तू भी उसे अपना
तू उससे प्रेम कर
उसके सान्निध्य में रह
तुम्हें शांति मिलेगी।

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