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नवंबर, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

झूठ ही सही लेकिन तुम बोलो

झूठ ही सही लेकिन तुम बोलो अच्छा लगता है सुनने में मुझे। अब तो आदत-सी पड़ गई है। झूठ के साथ जीना सीख लिया है मैंने तुम बोलो कि सत्ता में आने के बाद सबको रोजगार दूँगा तुम बोलो कि...

सच में वो आदमी नहीं, है मौन प्रतिमा-सा

सच में, वो आदमी नहीं वो है मौन प्रतिमा-सा जिनकी आँखे तो खुली है पर, देख पाने में असमर्थ है जिनके पास कान तो है पर, सुनने में असमर्थ है जिनके पास मुख तो है पर, बोलने में असमर्थ है स...

वो माँ है

रिस-रिसकर खत्म हो जाती है उनकी जिंदगी न जाने किस बात की सजा मिलती है उन्हें पूरी जिंदगी खत्म हो जाती है उनकी जिंदगी उन्हें सजने-संवारने में और सुंदर बनाने में अपनी पूरी खु...

ओ मजदूर ओ मजदूर

ओ मजदूर ओ मजदूर तुम्हीं हो क्रांति के दूत बड़ी-बड़ी अट्टलिकाएं बनी परी है तुम्हारे मेहनत का ही नतीजा है तुम्हारे कारण ही वे ऐशो-आराम की जिंदगी जीते हैं उल्टे तुम्हारा ही ख...

माँ-बाप

माँ-बाप के अहमियत का पता बच्चों को माँ-बाप के गुजर जाने के बाद चलता है। माँ-बाप जबतक आँखों के सामने होते हैं माँ-बाप की तबतक अहमियत नहीं होती। माँ-बाप की भूमिका में आते हैं जब ...

हिन्दी

बदल रही है देश की आबोहवा, अंग्रेजीदां लोगों से, सिमट रही है हिन्दी, अंग्रेजीदां लोगों से, हम खो रहे हैं अपनी पहचान, अंग्रेजीदां लोगों के कारण से, अपने ही देश में लड़ रही है हिन...

ऐ समय फिर एक बार लौट आ

ऐ समय ! फिर एक बार लौट आ / ताकि अपनी गलतियों को सुधार सकूँ / अपने गलत निर्णय पर पुनर्विचार कर सकूँ / एक बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकूँ / ऐ समय ! फिर एक बार लौट आ / अतीत का मूल्यांकन वर...

कोशिशें

सागर तट पर खड़ा हो देख रहा मैं आती-जाती लहरों को बार-बार चट्टानों से टकराती लहरों को लहरों की जीवटता और जिजीविषा को उसके इस समर्पण को शायद वह मुझसे कुछ कहना चाहती है कहकर फि...

प्रेम

सुरज में तपते देखकर / धरा पर प्यार आया बादल को / आ गया आँखों में आँसू / बस क्या था / बादल ने घेर लिया ज्वाला को / अपने आँसूओं से उसने/ ताप से मुक्त किया धरा को / बादल का समर्पण देखकर / भा...

एक इमानदार आदमी

जन्म से वह नहीं था झूठा वह नहीं था बेईमान और फरेबी गरीबी की चोट खाता रहा है वह हरदम हर मुश्किलों का सामना करता रहा है वह हरदम अपनी ज़मीर बचाए रखने की कोशिश में न जाने क्या-क्य...

ऐ सियासत तुम्हारे खेल निराले हैं

ऐ सियासत तुम्हारे खेल निराले हैं / जिसने तुमपे उंगलियां उठाई उसे मंत्री बना दिया / जिसने आँख खोली उसे सदा के लिए सुला दिया / जिसने तुम्हारे चौखटे पर मत्था टेके उसे लालकिला दे ...

एक नयी सुबह

आज फिर एक नई सुबह / एक नयी उमंग / नये उम्मीदों के संग / बढ़ चले हैं हम / बिना अंजाम की परवाह किए / आँखों में एक नये सपने लिए / उसके पीछे भागते / उठते गिरते खुद को सम्भालते / थकते-रूकते / औ...

मौसम की तरह बदलते हैं लोग यहां

मौसम की तरह बदलते हैं लोग यहां ऐ साहब ! अगर मैं हँसता हूँ तो सभी मेरे साथ हँसते हैं और जब मैं रोता हूँ तो केवल मैं ही रोता हूँ साथ छोड़ जाते हैं लोग हालात से खुद लड़ते हैं अपने ह...

हमसफ़र

मुझे  तुम्हारी   सुरत  नहीं,   सीरत    चाहिए। मुझे जो पलकों पर बिठाए, हमसाथी चाहिए।। मुझे   तुम्हारा   धोखा   नहीं,  साथ   चाहिए। मुझे  दर्द   देनेवाला   नहीं ,  हमदर्द   ...

खंडहर, जो कभी घर था

उन खंडहरों को देखो, जिसे कभी घर कहा जाता था, जिसमें कभी बच्चों की किलकारियाँ गूँजती थी, हँसी-ठहाके की आवाज़े आती थीं, चहल-पहल था, बुजुर्गों का साया था, भरा-पूरा परिवार था, खुशनु...

साहित्य की सार्थकता : वर्तमान संदर्भ

साहित्य की सार्थकता : वर्तमान संदर्भ प्रियदर्शन कुमार ------------------------------------------------------------------- जब हम साहित्य की सार्थकता की बात करते हैं तो इससे हमारा आशय यह है कि एक साहित्यकार अपने साहित्यिक उत्तर...

मैं लिखता हूँ तब, जब अंदर से रोता हूँ तब

मैं लिखता हूँ तब जब अंदर से रोता हूँ तब मैं अंदर से रोता हूँ तब जब पीड़ा में होता हूँ तब मैं पीड़ा में होता हूँ तब जब बिखरता हूँ तब मैं बिखरता हूँ तब जब अंदर से टूटता हूँ तब मैं ...

दीप जलती नहीं मन की

दीप जलती है यहां मगर जलती नहीं मन की काश कि ऐसा हो पाता तो अंधियारा नहीं होता हर तरफ है यहां पर झूठ - फरेब का बोलबाला हर एक को देखते हैं लोग यहां घृणा भरी नजरों से अगर खत्म करना ...