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नव-वर्ष

नव वर्ष ===== नव वर्ष नयी उम्मीद नये उमंग नयी सोच नये विचार नया आगाज नये लक्ष्य नया स्वप्न नये इरादे नयी कसमें नये वादे के साथ नया करने नया पाने के लिए बढ़े हम बढ़े सब इसी के सा...

आशा

आशा ============== धूंधला-सा हो गया हूँ मैं धूंधली-सी हो गई है मेरी छाया ढ़ल गया है दिन छा गया है अंधेरा इंतजार है उसे भी इंतजार है मुझे भी ये दिन भी गुजर जाएगा हमारे भी आएंगे अच्छे दिन सम...

अतीत बनाम वर्तमान

अतीत बनाम वर्तमान ====================================         अतीत और वर्तमान के बीच अपनी-अपनी प्रमुखता को लेकर बहस चल रही थी। वर्तमान ने अतीत से कहा कि तुम मेरे विकास में बाधक हो। मैं जब भी तुम्हें भूला...

किसान

काव्य संख्या-207 =========== किसान =========== मैं किसान हूँ मेरा काम है खेती का रहने के नाम पर मेरे पास एक घर है जो फूस का बना है बरसात के दिनों में टप-टप पानी टपकता है गर्मी के मौसम में सूर्य की कि...

बेटा-बेटी

काव्य संख्या-106 ===================== बेटा-बेटी ===================== समय की परिवर्तनशीलता को देखो कभी पराई समझी जाती थी बेटी घर की मेहमान होती थी बेटी घर से बिदा होती थी बेटी बेटी में जन्म लेना अपशकुन समझी जात...

टूटते पत्ते

टूटते पत्ते ====================== वृक्ष से जब पत्ते टूटकर अलग होते हैं पत्ते का अस्तित्व खत्म हो जाता है। जबतक पत्ते वृक्ष से जुड़े रहते हैं, वृक्ष बूढ़ा होकर भी, अपनी क्षमता तक, पत्तों का पा...

जीवन

जिंदगी =========== जीवन में न जाने कितने ही दौर आते हैं कभी सुख कभी दुख कभी हँसना कभी रोना कभी हैरान कभी परेशान कभी अच्छा कभी खराब कभी भला कभी बुरा कभी मिलना कभी बिछड़ना कभी अपनो का स...

अहसास

अहसास =============== मैं हँसता हूँ जब सबके बीच होता हूँ। मैं रोता हूँ जब अकेला होता हूँ। सबका साथ है फिर भी लगता नहीं कोई पास है। भीड़ में हूँ फिर भी अकेला हूँ। चेहरे पर हँसी है फिर भी पी...

बहू

माँ लगाती झाडू-पोछा बहुएं बैठती हैं सेज पर कितना विहंगम दृश्य लगता है कोई जाकर पुछे उन बेशर्मों से लज्जा क्या नहीं आती है उन्हें खुद को पढ़ी-लिखी की दावा करते गौरव से हमेशा ...

तू जिंदगी को मत कोस तू मत हो उदास यूं बैठ

तू जिंदगी को मत कोस तू मत हो उदास यूं बैठ ----------------------------- तू जिंदगी को मत कोस तू मत हो उदास यूं बैठ तू कर्म कर तू कर्म कर तू फल की चिंता मत कर तू नित अपने पथ पर आगे बढ़ता चल बढ़ता चल तू अपने लक्...

खामोशियां भी कुछ कह रहीं हैं

काव्य संख्या-202 =================== खामोशियां भी कुछ कह रहीं हैं =================== खामोशियां भी कुछ कह रहीं हैं उसे समझने की कोशिश करो। सबकुछ लफ्जों में बयां नहीं होता ईशारों में समझने की कोशिश करो। देश क...

झूठ ही सही लेकिन तुम बोलो

झूठ ही सही लेकिन तुम बोलो अच्छा लगता है सुनने में मुझे। अब तो आदत-सी पड़ गई है। झूठ के साथ जीना सीख लिया है मैंने तुम बोलो कि सत्ता में आने के बाद सबको रोजगार दूँगा तुम बोलो कि...

सच में वो आदमी नहीं, है मौन प्रतिमा-सा

सच में, वो आदमी नहीं वो है मौन प्रतिमा-सा जिनकी आँखे तो खुली है पर, देख पाने में असमर्थ है जिनके पास कान तो है पर, सुनने में असमर्थ है जिनके पास मुख तो है पर, बोलने में असमर्थ है स...

वो माँ है

रिस-रिसकर खत्म हो जाती है उनकी जिंदगी न जाने किस बात की सजा मिलती है उन्हें पूरी जिंदगी खत्म हो जाती है उनकी जिंदगी उन्हें सजने-संवारने में और सुंदर बनाने में अपनी पूरी खु...

ओ मजदूर ओ मजदूर

ओ मजदूर ओ मजदूर तुम्हीं हो क्रांति के दूत बड़ी-बड़ी अट्टलिकाएं बनी परी है तुम्हारे मेहनत का ही नतीजा है तुम्हारे कारण ही वे ऐशो-आराम की जिंदगी जीते हैं उल्टे तुम्हारा ही ख...

माँ-बाप

माँ-बाप के अहमियत का पता बच्चों को माँ-बाप के गुजर जाने के बाद चलता है। माँ-बाप जबतक आँखों के सामने होते हैं माँ-बाप की तबतक अहमियत नहीं होती। माँ-बाप की भूमिका में आते हैं जब ...

हिन्दी

बदल रही है देश की आबोहवा, अंग्रेजीदां लोगों से, सिमट रही है हिन्दी, अंग्रेजीदां लोगों से, हम खो रहे हैं अपनी पहचान, अंग्रेजीदां लोगों के कारण से, अपने ही देश में लड़ रही है हिन...

ऐ समय फिर एक बार लौट आ

ऐ समय ! फिर एक बार लौट आ / ताकि अपनी गलतियों को सुधार सकूँ / अपने गलत निर्णय पर पुनर्विचार कर सकूँ / एक बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकूँ / ऐ समय ! फिर एक बार लौट आ / अतीत का मूल्यांकन वर...

कोशिशें

सागर तट पर खड़ा हो देख रहा मैं आती-जाती लहरों को बार-बार चट्टानों से टकराती लहरों को लहरों की जीवटता और जिजीविषा को उसके इस समर्पण को शायद वह मुझसे कुछ कहना चाहती है कहकर फि...

प्रेम

सुरज में तपते देखकर / धरा पर प्यार आया बादल को / आ गया आँखों में आँसू / बस क्या था / बादल ने घेर लिया ज्वाला को / अपने आँसूओं से उसने/ ताप से मुक्त किया धरा को / बादल का समर्पण देखकर / भा...

एक इमानदार आदमी

जन्म से वह नहीं था झूठा वह नहीं था बेईमान और फरेबी गरीबी की चोट खाता रहा है वह हरदम हर मुश्किलों का सामना करता रहा है वह हरदम अपनी ज़मीर बचाए रखने की कोशिश में न जाने क्या-क्य...

ऐ सियासत तुम्हारे खेल निराले हैं

ऐ सियासत तुम्हारे खेल निराले हैं / जिसने तुमपे उंगलियां उठाई उसे मंत्री बना दिया / जिसने आँख खोली उसे सदा के लिए सुला दिया / जिसने तुम्हारे चौखटे पर मत्था टेके उसे लालकिला दे ...